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मुहूर्त समय
Choghadiya — शुभ और अशुभ समय
दिन का चौघड़िया
सूर्योदय से शुरू · 06:17 AMरात का चौघड़िया
सूर्यास्त से शुरू · 07:01 PMके लिए अंतर्दृष्टि April 19
#अक्षय_तृतीया ●
◆अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएं सम्प्रेषित हैं。
#अक्षय_तृतीया को पूर्ण चैतन्य काल व गजकेशरी अमृत सिद्धि काल कहा गया हैं एवं इसी दिन भगवान परशुराम अवतरित हुईं और त्रेतायुग का आरंभ भी अक्षय तृतीया को हुआ साथ ही बद्रीनाथ का दरवाजा इसी दिन खुलता हैं। अतः अक्षय तृतीया को श्री चक्र श्री यंत्र अष्टलष्मी/कनक धारा/धनदा लक्ष्मी पूजन/प्रयोग अति विशेष फलदायी होता ही है।
जानिए कुछ महत्वपुर्ण जानकारी:-
- ● आज ही के दिन जैन के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जी भगवान ने 13 महीने का कठीन निरंतर उपवास (बिना जल का तप) का पारणा (उपवास छोडना) इक्षु (गन्ने) के रस से किया थl और आज भी बहुत जैन भाई व बहने वही वर्षी तप करने के पश्चात आज उपवास छोड़ते है और नये उपवास लेते है और भगवान को गन्ने के रस से अभिषेक किया जाता है।
- ● आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था।
- ● महर्षी परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था।
- ● माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था।
- ● द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था।
- ● कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था।
- ● कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था।
- ● सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था।
- ● ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था।
- ● प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है।
- ● बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है। अन्यथा साल भर वो बस्त्र से ढके रहते है।
- ● इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था।
- ● अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है।
आखा तीज की पौराणिक कथा: चमत्कारी 'अक्षय पात्र' का रहस्य
अक्षय तृतीया या आखा तीज से जुड़ी एक अत्यंत प्रभावशाली कथा महाभारत काल की है। जब पांडव अपना राज-पाट हारकर 12 वर्ष के कठिन वनवास पर थे, तब उनके सामने भोजन की भारी समस्या उत्पन्न हो गई। ऋषियों, ब्राह्मणों और अतिथियों का सत्कार करना उनके लिए असंभव हो रहा था।
इस समस्या से व्याकुल होकर धर्मराज युधिष्ठिर ने सूर्य देव की कठोर उपासना की। सूर्य देव ने प्रसन्न होकर उन्हें एक चमत्कारी बर्तन प्रदान किया, जिसे 'अक्षय पात्र' कहा गया। सूर्य देव ने वरदान दिया कि यह पात्र कभी खाली नहीं होगा।
इस पात्र की विशेषता यह थी कि जब तक द्रौपदी भोजन कर नहीं लेती, तब तक इसमें से स्वादिष्ट भोजन कभी समाप्त नहीं होता था, चाहे कितने ही अतिथि क्यों न आ जाएं। शास्त्रों के अनुसार, यह चमत्कारी पात्र पांडवों को अक्षय तृतीया के पावन दिन ही प्राप्त हुआ था।
यही कारण है कि इस दिन अन्न दान, जल दान और भोजन कराने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन किया गया कोई भी दान या सत्कर्म 'अक्षय' हो जाता है—अर्थात उसका पुण्य कभी नष्ट नहीं होता और वह जन्म-जन्मांतर तक फल देता है।