Govind Dwadashi 2026: Date, Shubh Muhurat, Puja Vidhi & Mantras
Key Takeaway
When is Govind Dwadashi in 2026?
Govind Dwadashi falls on Saturday, 28 February 2026. It is celebrated on the 12th day (Dwadashi) of the Phalguna Shukla Paksha.
• Significance: Devotees worship the "Govind" form of Lord Krishna (the protector of cows and the earth).
• Puja Rule: Worship Krishna with Abeer, Gulal, and Yellow flowers. Chant "Govindaya Namastubhyam".
• Conclusion: The fast is concluded the next morning (March 1) by donating grains and clothes to Brahmins.

धर्म ग्रंथों (नारद पुराण एवं भविष्य पुराण) के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को गोविंद द्वादशी कहा जाता है।
"गो" (Go) का अर्थ है गाय (Cow) या पृथ्वी, और "विन्द" (Vind) का अर्थ है रक्षक। अर्थात्, जो गायों और पृथ्वी के रक्षक हैं। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के उस स्वरूप का पूजन किया जाता है जिसमें वह गायों के साथ दिखाई देते हैं।
Choose any of the following auspicious time slots to perform the Puja on 28th February 2026:
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संकल्प (Sankalp): सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। हाथ में जल, चावल और फूल लेकर व्रत और पूजा का संकल्प लें। शुभ मुहूर्त में भगवान गोविंद के चित्र के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
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श्रृंगार और अर्पण: भगवान को फूलों का हार पहनाएं और कुमकुम से तिलक लगाएं। इसके बाद चावल, रोली, अबीर, गुलाल और जनेऊ अर्पित करें।
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मंत्र जाप और हवन: पूजा करते समय निरंतर नीचे दिए गए मंत्र का जाप करें। भोग लगाकर आरती करें। पूजा के बाद तिल में घी मिलाकर 108 आहुतियों द्वारा हवन करें।"गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्" (Govindaya Namastubhyam)
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रात्रि जागरण: दिन भर व्रत के नियमों का पालन करें। रात में सोएं नहीं, बल्कि भगवान के भजन-कीर्तन करें।
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पारण और दान (Next Day): अगले दिन (1 मार्च, रविवार) सुबह ब्राह्मणों को भोजन कराएं। अनाज (Dhanya) और कपड़ों का दान करते हुए इस विशेष मंत्र का उच्चारण करें:नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ。
अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्गुरो॥
(अर्थ: हे गोविन्द! हे समस्त जगत के गुरु! मेरे द्वारा किये गये इस धान्य के दान से आप मुझ पर प्रसन्न हों।)
अग्नि पुराण सहित कई हिंदू धर्मग्रंथों में इस दिन का गहरा महत्व बताया गया है। यह महज एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक निवेश है। जिस प्रकार भगवान नरसिंह ने प्रहलाद को बचाने के लिए अवतार लिया था, उसी प्रकार इस व्रत का पालन करने से नकारात्मक ऊर्जाओं और पिछले कर्मों के बोझ से दैवीय सुरक्षा (Divine Protection) मिलती है।
इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा से करने से व्यक्ति को संसार में सभी सुख प्राप्त होते हैं। मृत्यु के बाद आत्मा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम धाम (वैकुंठ) को प्राप्त करती है।