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Dasha Mata Vrat 2026: Date, Shubh Muhurat, Peepal Tree Puja Vidhi & Dora Rules
Key Takeaway
When is Dasha Mata Vrat in 2026 and how is it celebrated? Dasha Mata Vrat will be observed on Friday, 13 March 2026. • Significance: Married women observe this fast to improve the condition ("Dasha") of their household and eliminate poverty. • Core Ritual: Women worship the Peepal tree and tie a special thread (Dora) made of 10 strings with 10 knots. • Fasting Rule: The fast is observed by eating sweet foods; regular grains are avoided, though wheat can be consumed once a day.

नवरात्रि से ठीक पांच दिन पहले 'दशा माता' की विशेष पूजा की जाती है। यह पावन व्रत सुहागिन महिलाएं अपने परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और घर की 'दशा' (Condition) सुधारने के लिए रखती हैं। इस दिन मुख्य रूप से पीपल के पेड़ की पूजा की जाती है। मान्यता है कि दशा माता की पूजा करने से घर की दरिद्रता दूर होती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
🗓️ दशा माता व्रत 2026 की तिथि
पंडित राकेश झा के अनुसार पंचांग की सटीक गणना इस प्रकार है:
(उदया तिथि के सिद्धांत अनुसार, जब तिथि सूर्योदय के दौरान लगती है तभी मान्य होती है)
दशा माता व्रत में 'डोरे' का चमत्कारिक महत्व
इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 'डोरा' (पवित्र धागा) होता है। महिलाएं सूत या रेशम का एक डोरा लेती हैं, जिसमें 10 धागों को मिलाकर 10 गांठें लगाई जाती हैं। इस डोरे को माता के समक्ष रखकर आशीर्वाद लिया जाता है और पीपल के पेड़ की परिक्रमा करते हुए पूजा की जाती है।
- पूजा के पश्चात् महिलाएं इस डोरे को अपने गले में धारण करती हैं।
- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस डोरे को कम से कम एक साल तक पहनना चाहिए।
- अगले वर्ष वैशाख मास में किसी शुभ तिथि पर ही इस डोरे को विधि-विधान से खोला जाता है।
- यह धागा जीवन में सुख-समृद्धि लाता है और रिश्तों में खुशहाली बनाए रखता है।
🍽️ व्रत व खान-पान के नियम
दशा माता व्रत में सामान्य अन्न ग्रहण नहीं किया जाता है। इस व्रत में मुख्यतः मीठा भोजन खाया जाता है। यदि आवश्यक हो, तो व्रत करने वाली महिलाएं दिन में केवल एक समय गेहूं से बना सात्विक भोजन ग्रहण कर सकती हैं।
📖 सामूहिक पूजा और कथा
इस व्रत की पूजा एकांत में नहीं, बल्कि पीपल के पेड़ के पास की जाती है। मोहल्ले की सभी महिलाएं एक साथ इकट्ठा होकर बैठती हैं और समूह में 'दशा माता व्रत कथा' का पाठ करती हैं या सुनती हैं।
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स्नान और शुद्धि: प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र (प्राथमिकता से सुहाग के रंग) धारण करें और पूजा स्थल व पीपल के पेड़ के पास सफाई कर शुद्ध करें।
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कलश स्थापना व आवाहन: पूजा की चौकी पर साफ वस्त्र बिछाकर कलश स्थापित करें। मिट्टी या गोबर से दशा माता की मूर्ति बनाएं और उनका आवाहन करें।
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पूजन व अर्पण: माता को रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य (मीठा प्रसाद) अर्पित करें। पीपल वृक्ष के जड़ में जल चढ़ाएं।
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डोरा-विधि और कथा: 10 गांठ वाले डोरे की विधि-विधान से पूजा करें और उसे धारण करें। इसके बाद सभी महिलाएं मिलकर दशा माता की व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
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सात्त्विक आचरण व विसर्जन: दिनभर सात्त्विक आचरण रखें, क्रोध व विवाद से बचें। अंत में आरती कर प्रसाद वितरित करें और माता की बनाई गई प्रतिमा का सम्मानपूर्वक विसर्जन करें।




